देखने में तो बज़ाहिर है वो अदना मुझसे
मोतबर दरिया में तिनका है ज़ियादा मुझसे
और अहसान किये जाती है दुनिया मुझ पर
जब कि पिछला ही अभी क़र्ज़ न उतरा मुझसे
ऐसे तकती हैं मुझे धूप, हवाएं, बारिश
जान को इनकी है जैसे कोई ख़तरा मुझसे
लोग फिरते हैं उठाये हुए दुनिया के ग़म
इक ग़मे-इश्क़ तअज्जुब है न संभला मुझसे
कुछ नहीं लगता मिरा है जो वो आईने में
हाँ ज़रा मिलता है उस शख्श का चेहरा मुझसे
एक धड़का सा लगा रहता है हर दम, पल-पल
‘साहिबो उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझसे’
इस पहेली को जो सुलझाओ तो मानूं तुमको
मैं नज़ारे से हूँ ‘सौरभ’ कि नज़ारा मुझसे
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