संजीदगी की ख़ास ज़ुरूरत तो है नहीं
अफ़साना है ये ज़ीस्त हकीक़त तो है नहीं
अदना सा एक दाइरा है इश्क़ो-बुग्ज़ का
इस दिल में आसमान की वुसअत तो है नहीं
इक सोच है ज़रा सी मिरी तुमसे मुख्तलिफ़
कुछ मेरी तुमसे ज़ाती अदावत तो है नहीं
बाज़ार से है सब को मुनाफ़े की ही गरज़
पर सब के पास तर्ज़े-तिजारत तो है नहीं
उसने ज़ुरूर कर लिया इक़बाल ज़ुर्म का
लेकिन नज़र में उसके नदामत तो है नहीं
लिक्खा है थोड़ी नाम किसी का हवाओं पर
ये धूप भी किसी की विरासत तो है नहीं
‘सौरभ’ तुझे ये ख़ौफ़ है रुसवाइयों का क्यूँ
ऐसी तिरी समाज में इज्ज़त तो है नहीं।
