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August 16, 2014

ग़ज़ल



ख़ूब पता है अब ये बात अज़ाबों को
मार नहीं सकते वो मेरे ख़ाबों को

पानी से भी धरती बंजर होती है
कैसे समझाऊं लेकिन सैलाबों को

इक दिन अम्बर का हर सूरज पिघलेगा...
इक दिन टूट के गिरना है मह्ताबों को

होटल आलीशान खुला है क़स्बे में
सहमा-सहमा देख रहा हूँ ढाबों को

अपनी पर आ जायें कलियां भी तो फिर
जल मरना पड़ सकता है तेज़ाबों को

दिल के महल पर नक़्श तुम्हारा ही है नाम
गौर से देखो मीनारों,मेहराबों को

लाज कलम की रखना 'सौरभ' जीते जी
रखना हर सूरत महफ़ूज़ क़िताबों को.

ग़ज़ल



देखने में तो बज़ाहिर है वो अदना मुझसे
मोतबर दरिया में तिनका है ज़ियादा मुझसे

और अहसान किये जाती है दुनिया मुझ पर
जब कि पिछला ही अभी क़र्ज़ न उतरा मुझसे

ऐसे तकती हैं मुझे धूप, हवाएं, बारिश
जान को इनकी है जैसे कोई ख़तरा मुझसे

लोग फिरते हैं उठाये हुए दुनिया के ग़म
इक ग़मे-इश्क़ तअज्जुब है न संभला मुझसे

कुछ नहीं लगता मिरा है जो वो आईने में
हाँ ज़रा मिलता है उस शख्श का चेहरा मुझसे

एक धड़का सा लगा रहता है हर दम, पल-पल
‘साहिबो उठ गया क्या मेरा भरोसा मुझसे’

इस पहेली को जो सुलझाओ तो मानूं तुमको
मैं नज़ारे से हूँ ‘सौरभ’ कि नज़ारा मुझसे

ग़ज़ल



फ़ज़ा का हब्स चीरती हुई हवा उठ्ठे
सफ़र में धूप है बहुत कोई घटा उठ्ठे

फिराये ज़िस्म पर मिरे वो उँगलियाँ ऐसे
कि साज़े-रूह मेरी आज झनझना उठ्ठे

जो और कुछ नहीं तो जुगनुओं को कर रक्सां
सियाह शब ज़रा-ज़रा सी जगमगा उठ्ठे

मिरी तरह तमाम लोग बेज़ुबां तो नहीं
किसी तरफ़,किसी जगह से मसअला उट्ठे

मिरा फ़ितूर ख़ुद सदायें दे मुझे मंज़िल
क़दम को चूमने मिरे ये रास्ता उठ्ठे

न जाने सुहबतों में उसकी है नशा कैसा
कि दर से उसके हर इक शख़्स झूमता उठ्ठे

करो  तो ज़िंदगी में ऐसा कुछ करे ‘सौरभ’
मिरी नज़र में तेरा यार मर्तबा उठ्ठे.

ग़ज़ल



सामान है इस दरजा अंबार से सर फोड़ो
दीदार करो छत का, दीवार से सर फोड़ो

दरिया के मुसाफ़िर को साहिल की तमन्ना क्यूँ
गिर्दाब से तुम उलझो, मंझधार से सर फोड़ो

आग़ोश में टी.वी. की हर शाम करो काली
हर सुब्ह उसी बासी अख़बार से सर फोड़ो

दुनिया के तकब्बुर से तुम बाद में टकराना
फ़िलहाल मियां अपने पिन्दार से सर फोड़ो

मत देख के घबराओ, लोगों से पटी सड़कें
बेहतर है इसी रश के कुहसार से सर फोड़ो

कोमल हैं रगें इसकी नाज़ुक है बदन ‘सौरभ’
आराम से, धीरे से, अब प्यार से सर फोड़ो

August 15, 2014

ग़ज़ल



संजीदगी की ख़ास ज़ुरूरत तो है नहीं
अफ़साना है ये ज़ीस्त हकीक़त तो है नहीं

अदना सा एक दाइरा है इश्क़ो-बुग्ज़ का
इस दिल में आसमान की वुसअत तो है नहीं

इक सोच है ज़रा सी मिरी तुमसे मुख्तलिफ़
कुछ मेरी तुमसे ज़ाती अदावत तो है नहीं

बाज़ार से है सब को मुनाफ़े की ही गरज़
पर सब के पास तर्ज़े-तिजारत तो है नहीं

उसने ज़ुरूर कर लिया इक़बाल ज़ुर्म का
लेकिन नज़र में उसके नदामत तो है नहीं

लिक्खा है थोड़ी नाम किसी का हवाओं पर
ये धूप भी किसी की विरासत  तो है नहीं

‘सौरभ’ तुझे ये ख़ौफ़ है रुसवाइयों का क्यूँ
ऐसी तिरी समाज में इज्ज़त तो है नहीं।

ग़ज़ल



हिर्सो-हवस के नाम ये दिन-रात की तलब
इम्दाद की उमीद, मफ़ादात की तलब

वो सानिहे कि सोच बदलनी पड़ी मुझे
पैदाइशी नहीं थी ख़यालात की तलब

मैं भी किसी मसीहा के हूँ इंतज़ार में
तुमको भी ग़ालिबन है करामात की तलब

ख़बरों में एक लुत्फ़ का पहलू तो है मगर
अच्छी नहीं है इतनी भी हालात की तलब

कैसा अज़ीब रोग मिरे जी को लग गया
हर वक़्त है किसी से मुलाक़ात की तलब

जुरअत से अपनी ख़ुद भी मैं हैरान हूँ बहुत
बढती ही जा रही है सवालात की तलब

तू भी गुनाहगार यक़ीनन है ज़ात का
‘सौरभ’ तिरी सज़ा भी वही, ज़ात की तलब

ग़ज़ल



दावा करूँ कि संग था इक, वो गुहर न था
इतना यक़ीन मुझको मिरी आँखों पर न था

हैवानियत से जिसकी यूँ हैरतज़दा थे लोग
इंसान था मियां वो कोई जानवर न था

बू ख़ून की न आती थी किस हाथ से कहो
दामन लहू से बोलो ज़रा किसका तर न था

था हमक़दों का ख़ाक उड़ाता हुज़ूम इक
परचम कहीं नहीं था, कोई राहबर न था

उसका ख़याल, उसकी तलब, उसकी जुस्तजू
‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’

ताज़ा है दिल का ज़ख्म मगर हँस रहा हूँ मैं
ग़मगीन रहना था अभी अफ़सोस करना था

रह-रह के कसमसाता था क्या जिस्म में मिरे
‘सौरभ’ बदन में क़ैद मिरे कुछ अगर न था.

ग़ज़ल



यक़ीन मर गया मिरा, गुमान भी नहीं बचा
कहीं किसी ख़याल का निशान भी नहीं बचा

ख़मोशियाँ तमाम ग़र्क़ हो गयीं ख़लाओं में
वो ज़लज़ला था साहिबो बयान भी नहीं बचा.

नदी के सर पे जैसे इंतक़ाम सा सवार था
कि बाँध, फस्ल, पुल बहे, मकान भी नहीं बचा

हुजूम से निकल के बच गया उधर वो आदमी
इधर हुजूम के मैं दरमियान भी नहीं बचा

ज़मीं दरक गयी सुलगती बस्तियों की आग से
ग़ुबार वो उठा कि आसमान भी नहीं बचा

बिखरती-टूटती फ़सील नींव को हिला गयी
कि दाग़ ज़ात पर था, ख़ानदान भी नहीं बचा

तमाम मुश्किलों को हमने नींद में दबा दिया
खुला ये फिर कि कोई इम्तिहान भी नहीं बचा

ग़ज़ल

ग़ज़ल 

ख़राबे में बौछार हो कर रहेगी
गली दिल की गुलज़ार हो कर रहेगी

हुकूमत ग़मों की नहीं चलने वाली
मसर्रत की यलग़ार हो कर रहेगी

कि शाखों पे फूलों के गुच्छे तो देखो
ये  बग़िया समरदार हो कर रहेगी

भरे जायेंगे ग़ार पर्वत गिरा कर
ये धरती तो हमवार हो कर रहेगी

लकीरें फ़क़त खेंचता जा वरक़ पर
कोई शक्ल तैयार हो कर रहेगी

मैं ऐसा फ़साना सुनाने को हूँ अब
कि शब भर तू बेदार हो कर रहेगी

ये  पागल हवा और सफ़र बेकराँ ये
जुदा सर से दस्तार हो कर रहेगी

चलाऊंगा तेशा मैं अब आजिज़ी का
 अना उसकी मिस्मार हो कर रहेगी

ग़ज़ल



फिर यूँ हुआ ये काम ज़रूरी सा हो गया
जज़्बात पर लगाम ज़रूरी सा हो गया

हमसाये शर्मसार मिरी सादगी से थे
थोड़ा सा ताम-झाम ज़रूरी सा हो गया

परचम उठाये फिरता मैं बेसम्त कब तलक
इक ठौर, इक मुकाम ज़रूरी सा हो गया

कुछ रोज़ मैंने ग़म को मुसलसल किया ज़लील
फिर ग़म का एहतिराम ज़रूरी सा हो गया

शेरो-सुखन से दिल तो बड़ा शाद था मगर
फ़र्दा का इंतज़ाम ज़रूरी सा हो गया

जल्वों में कुछ कशिश न तमाशों में कोई बात
अब तो नया निज़ाम ज़रूरी सा हो गया

छलके कहीं न दर्द का पैमाना देखिये
‘सौरभ’ मियां कलाम ज़रूरी सा हो गया.

ग़ज़ल



सफ़ेद रंग भी इक ज़ाविये से काला है
सियाहियों में भी पैबस्त कुछ उजाला है

ख़ता ज़रा भी नहीं रास्तों के काँटों की
गुनाहगार मिरे पाँव का ही छाला है

ये कैसा खौफ़ तुझे है बता मिरे भाई
निगाहें चीख रही हैं, ज़बां पे ताला है

ये सर्द रात,ये ख़लवत, अलाव माजी का
बदन पे गुज़रे दिनों का मिरे दुशाला है

अलमनसीबों से दरयाफ़्त कर के बतलाता
‘अँधेरा है कि तिरे शह्र में उजाला है’

ख़बर तवज्जो के लायक़ नहीं है वैसे तो
तिरे बयान में बेशक बहुत मसाला है

ज़माने भर की जुटा लेगा बदगुमानी वो
उसे सचाई से क्या और मिलने वाला है

मिज़ाजपुर्सी तो करते हैं चार लोग तिरी
ये कम नहीं है, तू ‘सौरभ’ नसीबवाला है

ग़ज़ल



मिला न खेत से उसको भी आबो-दाना क्या
किसान शह्र को फिर इक हुआ रवाना क्या

कहाँ से लाये हो पलकों पे तुम गुहर इतने
तुम्हारे हाथ लगा है कोई ख़ज़ाना क्या

उमस फ़ज़ा से किसी तौर अब नहीं जाती
कि तल्ख़ धूप क्या, मौसम कोई सुहाना क्या

तमाम तर्ह के समझौते करने पड़ते हैं
मियां मज़ाक़ गृहस्थी को है चलाना क्या

गुनाह कुछ तो मुझे बेतरह लुभाते हैं
ये राज़ खोल ही देता हूँ अब छुपाना क्या

हो दुश्मनी भी किसी से तो दाइमी क्यूँ हो
जो टूट जाये ज़रा में वो दोस्ताना क्या

ख़बरनवीस नहीं हूँ मैं एक शायर हूँ
तमाम मिसरे मिरे हैं, नया-पुराना क्या

न धर ले रूप कभी झोंक में तलातुम का
‘वो नर्म रौ है नदी का मगर ठिकाना क्या’

करो तो मुंह पे मलामत करो मिरी ‘सौरभ’
ये मेरी पीठ के पीछे से फुसफुसाना क्या.

ग़ज़ल


ग़ज़ल
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सरकार बख्शते हैं मुझे नौकरी सही
फिर भी ग़लत को कह न सकूंगा कभी सही

ज़ालिम ने फिर मचाया वो कुहराम एक दिन
इक उम्र मेरे दिल ने मिरी बेरुख़ी सही

आवाज़ दूं, पुकारूं किसी को मैं दश्त में
दिखलाई तो दे मुझको कोई आदमी सही

सच-झूठ की कहानी मुकम्मल न जानिये
कुछ आख़िरी ग़लत है न कुछ आख़िरी सही

रहबर ने बार-बार ही भटका दिया मुझे
साबित हुई हमेशा मिरी गुमरही सही

इक आपके अलावा ग़लत है हरेक शख़्स
‘अच्छा ये आप समझे हैं,अच्छा यही सही’

हालांकि मैंने तुमको सदा अनसुना किया
‘सौरभ’ तुम्हारी बात तो हर बार थी सही.