स्वागतम!

स्वागतम!

December 1, 2013

ग़ज़ल
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किया करता हूँ ख़ुद से ही ज़िरह मैं 
पशेमां किसलिए हूँ इस तरह मैं

लगे ख़्वाबों के पंछी फिर चहकने 
करूँ कैसे उन्हें फिर से ज़िबह मैं 

लिखो गर लिख सको तो हर्फे रौशन 
वरक उजला नहीं हूँ,हूँ सियह मैं

झिझक से तुम जो अपने आओ बाहर
तो दिल की खोल दूँ इक-इक गिरह मैं

मुझे कोसेंगी मेरे बाद नस्लें 
उजाला तीरगी को दूँ तो कह मैं

मुझे बेकार मुझमे ढूंढते हो
बचा हूँ ही नहीं अब शख्स वह मैं

करूँ ऐसा कि ग़म में  डूब जाऊं 
तभी तो पाउँगा फिर इसकी तह मैं

तुझे पहनाऊं पैराहन ग़ज़ल का 
अमर कर डालूं तुझको इस तरह मैं.

पशेमां- शर्मिंदा
ज़िबह-गला रेतना
हर्फे-रौशन- चमकदार अक्षर
वरक- पृष्ठ
नस्लें-पीढियां
सियह- काला
तीरगी- अँधेरा  
पैराहन- वस्त्र  
ग़ज़ल
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वो देगा हिज्र का इनआम मुझको
ज़रा भर था नहीं इल्हाम मुझको

बजाता था ग़ज़ल की बाँसुरी मैं
कहा करती थी वो भी श्याम मुझको

उदासी के भँवर में आज फिर से
धकेले जा रही है शाम मुझको

तेरे बिन काटने को दौड़ते हैं
दरो-दीवार,फर्शो-बाम मुझको

सफ़र की इब्तिदा में साथ हैं सब
मगर मालूम है अंजाम मुझको

मेरी तारीफ़ की पर इस अदा से
क़सीदा भी लगा इलज़ाम मुझको

मरासिम दर्द से गहरे हैं मेरे
अगरचे आयगा आराम मुझको

ग़ज़ल से आशिक़ी की इब्तिदा है
अभी रहना है कुछ गुमनाम मुझको
-सौरभ.

(हिज्र=वियोग,इल्हाम=एहसास,दरो-दीवार=दरवाजा और दीवार,फर्शो-बाम=फर्श और छत,इब्तिदा=शुरुआत,क़सीदा=प्रशंसा,मरासिम=प्रेम सम्बन्ध,अगरचे=हालाँकि.)
ग़ज़ल
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उठीं पलकें मेरी जानिब ज़रा क्या
उड़ाई जा रही है बात क्या-क्या

ग़ज़ब का शोर था हर सम्त बरपा
वहां मैं बोलता तो बोलता क्या

मैं क्यूँ मह्वे-दुआ रहता हूँ अक्सर
यकीं खुद पर गया है डगमगा क्या

फ़क़त अब मौसमों के तज़किरे हैं
वो मुझसे इस कदर उकता गया क्या

बज़िद इन्साफ पर हो तो बताओ
नदामत से बड़ी भी है सज़ा क्या

मेरी आँखों को बख्शे उसने आंसू
सो तुहफ़ा मोतियों का है बुरा क्या

सभी मायूस वापस आ रहे हैं
'यहाँ से बंद है हर रास्ता क्या'

अजब बेमंज़री है आसमां में
हर इक ताइर यहाँ है परकटा क्या

ग़ज़ल कहने लगी इक रोज़ मुझसे
तुम्हारे पास है 'सौरभ' नया क्या




(जानिब=तरफ,महवे-दुआ=प्रार्थनारत,फ़क़त=सिर्फ,तज़किरे=बातचीत, बज़िद=तुले हुए,नदामत=पश्चाताप, बेमंज़री=दृश्यहीनता,ताइर=पंछी)
ग़ज़ल
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ख़ाली-ख़ाली,बेमतलब, बेमानी शाम
एक उदासी की जैसे तुग़यानी शाम

उलझन का भी रब्त नहीं बाक़ी अब तो
मैं उससे हूँ, है मुझसे बेगानी शाम

तनहा, ढलता सूरज सबकी आँखों में
बाँट रही है ये कैसी वीरानी शाम

शह्रों शह्रों एक सा मंज़र फैला है
नाहक ढूंढ रहा हूँ मैं लासानी शाम

ओढ़ हरी चूनर फिर से तुम आ जाओ
और फ़ज़ा में छा जाये फिर धानी शाम

इसके जैसा इश्क़ हमें भी है दिन से
हमको दुश्मन कर लेगी दीवानी शाम

क्यों खोला फिर से तुमने अपना जूड़ा
देखो फिर से हो गई पानी-पानी शाम

वक़्त ठहर जाता है उसकी सुहबत में
कर देती है शब की नाफ़र्मानी शाम

शेर सरीखी लगती थी 'सौरभ' तुमको
रफ्ता-रफ्ता बन गई एक कहानी शाम
ग़ज़ल
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नहीं जल पाया ये अंतिम दिया तो
अँधेरा मेरे घर में टिक गया तो

मैं ज़ाहिर कर तो दूँ जज़्बात दिल के
उठा ले गर वो उनका फायदा तो

अभी दिलचस्पियाँ परवान पर हैं
मेरा दम बज़्म में घुटने लगा तो

ख़ुशी से ख़ामुशी ओढ़ी नहीं थी
मैं कहता कुछ मगर कुछ सूझता तो

अदाकारी करो तुम इश्क की पर
उसे सच मान लूँ मैं बावला तो?

दिलासा दे रहा हूँ दूसरों को
गुज़र जाये मुझी पर सानिहा तो

लरज़ते लब फ़क़त मैं देख पाया
बिछुड़ते वक़्त बोला था वो क्या तो

फिरा हूँ दर-ब -दर जिसके लिए मैं
वही गर दे मिरा दर खटखटा तो

मुझे हर हाल में रुकना पड़ेगा
'दिया अपना जो उसने वास्ता तो'

इसी इक ज़ीस्त से तो बाख़बर हूँ
कम अज़ कम जी लूँ मैं इस मर्तबा तो

तेरी निभ जाएगी 'सौरभ' जहाँ से
तू अपने आप से पहले निभा तो
ग़ज़ल
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पानी में कंकड़ बरसाया करते थे
वे दिन जब हम लम्हे ज़ाया* करते थे

होड़ हवा से अक्सर लगती थी अपनी
अक्सर उसको धूल चटाया करते थे

देख के हमको राहगुज़र मुस्काती थी
पेड़ भी आगे बढ़ कर छाया करते थे

धूप बटोरा करते थे हम सारा दिन
शाम को बाँट के घर ले जाया करते थे

आज़ घटा अफ़्सुर्दा* करती है हमको
हम बारिश में खूब नहाया करते थे

एक यही हम देखें सब खामोशी से
एक यही हम शोर मचाया करते थे

'सौरभ' शब* थी एक वरक़* सादा जिस पर
लिख-लिख कर हम ख़ाब मिटाया करते थे

 ग़ज़ल
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ज़रा सा ज़ात* से दीगर भी हूँ
मैं जो हूँ,उससे कुछ हट कर भी हूँ

मियाँ बर्ताव पर निर्भर है सब
अगर मैं मोम हूँ,पत्थर भी हूँ

बहुत मुश्किल मिरा किरदार है
कि हूँ मैं खेल में,बाहर भी हूँ

मिरा कुछ शौक़ है आवारगी
मैं तिस पर शहर में बेघर भी हूँ

फ़क़त मैं ज़िस्म की कैसे सुनूँ
मैं अपनी रूह का नौकर भी हूँ

तबीअत की मेरे मत पूछिए
बहुत हस्सास* हूँ,शायर भी हूँ

मिरा मक़सद है बस उसकी हँसी
मैं उसके वास्ते जोकर भी हूँ

मिरी दीवानगी हद में ज़रा
कि मैं इक बाप हूँ,शौहर भी हूँ

--सौरभ

ज़ात=शख्सियत

हस्सास=संवेदनशील ग़ज़ल
ग़ज़ल
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आइना सामने है फिर मेरे
मुझ पे सब ऐब हैं ज़ाहिर मेरे

कोई आँखों से मिरी रोया था
भीगे-भीगे हैं मनाज़िर* मेरे

सबसे कह दे कि निहत्था हूँ मैं
डुगडुगी पीट दे मुख़बिर मेरे

शब* ढले तंज़ किया शाखों ने
थे कहाँ सुब्ह से ताइर* मेरे

है तसव्वुर* में अभी इक दुनिया
चंद अरमान हैं ज़ाहिर मेरे

उसको गच्चा न दिया तो कहना
आके दुःख देखे तो घर फिर मेरे

कौन सोता है मिरी नींदों में
ख़ाब किसके हैं ये आख़िर मेरे

दिल सभी से नहीं मिलता साहब
दोस्त हैं तो कई शाइर मेरे

चाल चलने की नहीं जल्दी कुछ
सोच कुछ और मुफक्किर* मेरे

-सौरभ
मनाज़िर =दृश्य
शब =रात
ताइर =पंछी
तसव्वुर=कल्पना
मुफक्किर =चिन्तक
ग़ज़ल 
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पूरे दिन का हिसाब करती है
रात मुझ पर गिरां* गुज़रती है

क्या हुआ कौल* को रिहाई के
शर्म कर ज़िन्दगी! मुकरती है

अब बदल दो मेरे नज़ारों को
रूह इनसे मेरी सिहरती है

खोखला होन जाऊं अन्दर से
चुपके-चुपके अना* कुतरती है

कोई ख़्वाहिश है दिल की लहरों में
डूबती है न जो उभरती है

तेज़ चलिए कि वक़्त की गाड़ी
एक दो पल को ही ठहरती है

फिर गवारा नहीं वो शै मुझको
जी से इक बार जो उतरती है

आसमानों की फिक्र तू कर ले
मेरे पैरों तले तो धरती है

बात मुझसे करो ही क्यों 'सौरभ'
बात मेरी अगर अखरती है।।

गिरां=भारी
कौल =वचन
अना=अहम
ग़ज़ल
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अपनी चुप्पी पचा न पाये हम
नींद में खूब बड़बड़ाये हम

क्यों न होंगे तपे-तपाये हम
उम्र भर धूप में नहाये हम

इक तो रातें तवील हो गई हैं
शम्म भी बैठे हैं बुझाये हम

सिर्फ बेचैनियाँ ही बचनी थीं
हैं तो ख़ाहिश के अपनी साये हम

रेत की थी हमारी हस्ती क्या
एक ठोकर में भरभराये हम

कोई तहरीर थी हवाओं में
सिर्फ उन्वान देख पाये हम

है ज़लालत से साबक़ा बाहर
घर में घुसते हैं सर उठाये हम

ये बदन इक तिलिस्म था हमको
तोड़ हरगिज़ न जिसको पाये हम

ख़ाब का दर खुले कि दाखिल हों
एक भी पल बिना गँवाये हम

मोतबर बेख़ुदी में थे 'सौरभ'
होश में आ के लड़खड़ाए हम।।
ग़ज़ल

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फ़रियादें, दरख़्वास्त, गुहारें एक तरफ़
हाकिम,तंज़ीमें*,सरकारें एक तरफ़

दीवानों का बस्ती-बस्ती चर्चा है
इक जानिब सर हैं, तलवारें एक तरफ़

एक तरफ़ हंगामा है आवाज़ों का
और ख़मोशी की झंकारें एक तरफ़

देखें पलड़ा झुकता है अब किस जानिब
एक तरफ़ ग़ैरत, दीनारें* एक तरफ़

एक तरफ़ इन्सान दुबक कर बैठा है
और गुनाहों की ललकारें एक तरफ़

जंग उजालों की ज़ुल्मत* से जारी है
एक तरफ़ रौज़न*, दीवारें एक तरफ़

हाथ झटक कर बादल फिर से दूर गया
छोड़ के धरती की मनुहारें एक तरफ़

मुड़ना है किस ओर करो अब तय ‘सौरभ’
एक तरफ़ तूफाँ, मँझधारें एक तरफ।।

तंज़ीमें=संस्थाएं
दीनारें=सिक्के
ज़ुल्मत=अँधेरा
रौज़न =छिद्र
ग़ज़ल
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इक चराग़े-दिल फ़क़त रौशन अगर मेरा भी है
रहनुमा मेरा भी है, फिर राहबर* मेरा भी है

अब तलक हैरान हूँ मैं रात के उस ख़ाब से
ख़ून की बरसात है,घर तर-ब-तर मेरा भी है

शर्त हर मंज़ूर कर ली ज़िन्दगी की मैंने भी
दस्तख़त अब इस क़रारे-ज़ीस्त* पर मेरा भी है

यूँ बहारों के लिए महवे-दुआ* रहता हूँ मैं
फूल की मानिंद इक लख्ते-जिगर* मेरा भी है

हुस्न है तू 'तेरा भी चर्चा रहेगा दाइमी*
इश्क़ हूँ मैं और अफ़साना अमर मेरा भी है

पेड़, मिटटी, धूप, पानी में अदावत* हो गयी
फूल लगते ही सभी बोले समर* मेरा भी है

माहो-अंजुम* रख न रख उसमें मिरे मालिक मगर
‘आसमां इक चाहिये मुझको कि सर मेरा भी है’

आलिमों* की बात का ‘सौरभ’ भरोसा है मुझे
तज़रबा कुछ ज़िन्दगी का हाँ मगर मेरा भी है
ग़ज़ल
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मेरे अच्छे हैं रिश्ते हर किसी से
बस इक बनती नहीं है ज़िन्दगी से

उदासी मेरी फितरत बन गई है
मुझे तकलीफ़ होती है ख़ुशी से

मैं सहरा* से ही पूछुंगा किसी दिन
निभाना है कहाँ तक तिश्नगी* से

पशेमानी* मुझे किस बात की है
मुख़ातिब हूँ मैं किस शर्मिंदगी से

झुके बिन भी मैं सज़दा कर रहा हूँ
पुकारे जा रहा हूँ ख़ामुशी से

मैं हकलाता नहीं हूँ बोलने में
मैं नर्वस था तिरी मौजूदगी से

दरीचा* बंद रहता है तुम्हारा
गुज़रता रोज़ हूँ मैं इस गली से

मैं उसके ध्यान में रहने लगा हूँ
यही इक फायदा है दुश्मनी से

जुनूं का एक तिनका हाथ आये
मैं दरिया पार कर लूँगा उसी से

-सौरभ।

सहरा=रेगिस्तान
तिश्नगी=प्यास
पशेमानी=पश्चाताप
दरीचा=खिड़की
ग़ज़ल
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तन्हाई का इलाज ये मंहगा बहुत पड़ा
उकता के मैंने न्यूज़ का चैनल लगाया था

बस ये कि वज्ह तर्के-तअल्लुक़* की कुछ रहे
उसने ज़रा सी बात पे झगड़ा खड़ा किया

बिगडैल हो चले थे कई दिन से मेरे ख़ाब
सच की छड़ी से शाम उन्हें सीधा कर दिया

खोला था रात माज़ी का इक एलबम कि उफ़
यादों का मेरे ज़ह्न में तांता बंधा रहा

वो बार-बार पूछ रहा था वही सवाल
मजबूर हो के झूठ मुझे बोलना पड़ा

दरिया ने मेरे पाँव उखाड़े शुरूअ में
जब मैं डटा रहा तो वो कमज़ोर पड़ गया

तन्हाई का तुम्हारी था मुमकिन यही इलाज
घर के हर एक कोने को चीज़ों से भर दिया

तर्के-तअल्लुक़= रिश्ता तोड़ना
ग़ज़ल

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एक रौज़न* के अभी किरदार में हूँ मैं
गौर से देखो इसी दीवार में हूँ मैं

सब मनाज़िर* ज़र्द* से पड़ने लगेंगे क्यों
बेयक़ीनी के किसी आज़ार* में हूँ मैं

टूट जाये आसमां धरती भी फट जाए
क्या मुझे परवा कि बज़्मे-यार में हूँ मैं

ज़ह्न में औलाद है, और घर की जानिब हूँ
रुक नहीं सकता अभी रफ़्तार में हूँ मैं

दख्ल मेरा भी रहे कुछ मेरी हस्ती में
ये न कल महसूस हो बेकार में हूँ मैं

घर की हर शै क्यों मुझे बेनूर लगती है
क्या ज़ियादा आज कल बाज़ार में हूँ मैं

शुहरतों का आखिरी चारा जराइम* था
देखिये अब किस क़दर अखबार में हूँ मैं

गुफ़्तगू से कब मुझे परहेज़ है 'सौरभ'
बोलता-सुनता मगर अशआर* में हूँ मैं.

रौज़न=दीवार का छिद्र
मनाज़िर=दृश्य
ज़र्द=पीला
जराइम=अपराध
अशआर=शेर का बहुवचन
ग़ज़ल
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वीरानियों के ख़ार* तो फूलों की छुअन भी
इस राह में आये हैं बियाबां भी ,चमन भी

खुलना था फ़क़त एक दरीचा* मेरे घर का
फिर रौशनी भी आई, हुई दूर घुटन भी

बच्चे ने सजाई है कोई और ही दुनिया
खींचा है जहां बाघ वहीँ रक्खा हिरन भी

याद अपने वतन की मुझे आती नहीं अब तो
अब भूल चूका होगा मुझे मेरा वतन भी

हस्सास* बना डाला मुझे हद से ज़ियादा
तिस पर से मुहब्बत ने दिया शेर का फ़न भी

किस खोज में थे शह्र के सब लोग न जाने
चेहरों पे.उदासी भी है आंखों में थकन भी

आसान नहीं है ये सफ़र रूह का ‘सौरभ’
हाइल* है तिरी राह में इक दश्ते-बदन* भी.

ख़ार=कांटे
दरीचा=खिड़की
हस्सास=संवेदनशील
हाइल=अवरोधक
दश्ते-बदन=बदन रुपी जंगल
ग़ज़ल
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चूर अना* कर दी सारा पत्थरपन तोड़ दिया
आग ने कुछ पल में पिघला कर लोहा मोड़ दिया

फिक्र मुझे अपने बच्चों के सर की होती थी
जर्जर घर था सच्चाई का आख़िर छोड़ दिया

अपने चारों और उठा दी मैंने दीवारें
इक सूराख़ मगर माज़ी* का उसमे छोड़ दिया

नोच घरौंदा भी न भरा जब उस बंदर का जी
उसने फिर चिड़िया का इक इक अंडा फोड़ दिया

पीछे पीछे घर आ जाते हैं कुछ पालतू डर
लाख उन्हें मैंने रस्ता भटका कर छोड़ दिया

रोज़ो-शब* के इम्तिहान से आजिज़ आ कर आज
फाड़ दिया पर्चा मैंने उत्तर मुंहतोड़ दिया

अना=घमंड
माज़ी=अतीत
रोज़ो-शब=दिन-रात
ग़ज़ल
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मुझको दुनिया नहीं सुहाती है
हाँ मगर ये ख़याल ज़ाती* है

तेज चलना मुझे भी भाता है
पर मेरी सांस फूल जाती है

ख़ाब मुझको अज़ाब* देते हैं
नींद बेचैनियाँ बढ़ाती है

ज़ुल्म मुझसे सहा नहीं जाता
चीख़ मेरी निकल ही जाती है

नीम पागल है ये भिखारन भी
चौक को रोज़ लीप आती है

कोई घर है इन्ही अंधेरों में
दूर इक लौ सी टिमटिमाती है

खोजिये मत तमीज़ मुफलिस* की
भूख तहज़ीब लील जाती है

तीर गर आपके हैं तरकश में
पास अपने भी एक छाती है.

ज़ाती=निजी
अज़ाब=यातना
मुफलिस=निर्धन
ग़ज़ल
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लाचारी में हूँ, हैरानी में हूँ मैं
जह्नो-दिल की खींचातानी में हूँ मैं

बीच भंवर वालों की क्या हालत होगी?
खौफ़ज़दा जब छिछले पानी में हूँ मैं

था इक वक़्त कि मेरा दिल भी बाग़ी था
शामिल अब फौज़े-सुल्तानी में हूँ मैं

ज़द में हूँ मैं दिल की सी.सी.टी.वी. की
चौबीसों घंटे निगरानी में हूँ मैं

यूँ महसूस हुआ कल इक नॉविल पढ़ कर
ये मेरा किरदार,कहानी में हूँ मैं

हर सूरत में मुझको तनहा होना है
भीड़ में हूँ या फिर वीरानी में हूँ मैं

रहमत होनी है ‘सौरभ’ तो उन पर हो
जिनकी तुलना में आसानी में हूँ मैं.
ग़ज़ल
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मसअलों से जहां के कट कर हम
ज़ात* में क्यूँ रहें सिमट कर हम

ग़ुमरही का अगरचे* ख़तरा है
लीक से देखते हैं हट कर हम

लज्ज़तें दुःख की कम नहीं होतीं
सुख से तो चल दिए उचट कर हम.

एक ठंडक मिली कलेजे को
रो लिए माँ से जब लिपट कर हम

कौन छुप जाता है सदा दे कर
देखते जैसे हैं पलट कर हम

जश्न का लुत्फ़ भी उठाएंगे
रिज्क़* से हाँ मगर निबट कर हम

शोर करता है गर ज़ियादा दिल
चुप करा देते हैं डपट कर हम
-सौरभ.

ज़ात=स्वयं
अगरचे=हालांकि
रिज्क़ =रोज़ी-रोटी
ग़ज़ल
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नाम ज़ालिम का लिया चाहती है
अब जुबां मेरी खुला चाहती है

करवटें लेने लगा सन्नाटा
चीख इक मुझमे जगा चाहती है

हर मुसीबत से रफ़ाक़त* मेरी
हर बला मेरा भला चाहती है

पासबानी* वो करे ख़ुद उनकी
जिन चरागों को हवा चाहती है

लालची कौम है ये किस दर्ज़ा
रोटियां,कपड़े,दवा चाहती है

आज फिर मॉल में मेरी पॉकेट
मुझको शर्मिंदा किया चाहती है

उसने ये कह के बुलाया है मुझे
मशवरा एक ज़रा चाहती है

ज़िन्दगी हाय तिरी बेशर्मी
बेवफ़ा मुझसे वफ़ा चाहती है

कब किसी की है सुनी किस्मत ने
कब ये 'सौरभ' की रज़ा चाहती है.

रफ़ाक़त=दोस्ती
पासबानी=निगरानी.
ग़ज़ल
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मेरी तुझसे क्या टक्कर है
मैं इक शय* तू सौदागर है

ख़ाबों तुम आहिस्ता आना
मेरी नींद का पुल जर्ज़र है

ग़ाफिल रहने दो बच्चों को
फिर तो आगे डर ही डर है

दुखियारों की इस बस्ती के
हर घर में इक पूजाघर है

शाम में दिन तब्दील हुआ अब
अब हर साया क़द्दावर है

अच्छे मूड में है वो, दिल की
कहने का अच्छा अवसर है

हाथ मिलाओ अहले-मुहब्बत*
नफ़रत काफ़ी ताक़तवर है

सच मत बोलो उस पागल से
उसके हाथों में पत्थर है

ग़ीबत* की इस आबो-हवा में
‘सौरभ’ का रहना दूभर है

शय=वस्तु
अहले-मुहब्बत=प्यार करने वालों
ग़ीबत= पीठ पीछे निंदा.
ग़ज़ल
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सभी यूँ हैं कहने को बाज़ार में
मुनाफ़े का बंटवारा दो-चार में

हटाया गया मेरे कांधों से बोझ
हिलाया था सर मैंने इनकार में

जुनूं ने धकेला नदी में मुझे
ख़िरद* मुझपे हावी है अब धार में

यही एक मौक़ा मिरे पास है
गिराना है ग़म को इसी वार में

मुझे भी शिकायत नहीं दश्त* से
अगर ख़ुश है वो अपने घर -बार में

नुमाइश ही करते थे बैठक में तुम
लगी आख़िरश ज़ंग तलवार में

ख़ुशी में बहुत याद आती है माँ
बहुत गाँव खलता है त्यौहार में

पहाड़ों में खोजूंगा झरना कोई
मैं खिड़की तलाशूंगा दीवार में

हरी दूब शायद दबी हो कोई
'इन्हीं ज़र्द पत्तों के अंबार में '

अमां फर्क़ कुछ तो रखा कीजिये
सुख़नगोई* में और तकरार में

बदलना नहीं कुछ भी 'सौरभ' यहाँ
जलाते हो जी अपना बेकार में.

ख़िरद=बुद्धि
दश्त=जंगल
सुखनगोई=कविता.
ग़ज़ल
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ख़ूब पता है अब ये बात अज़ाबों* को
मार नहीं सकते वो मेरे ख़ाबों को

पानी से भी धरती बंजर होती है
कैसे समझाऊं लेकिन सैलाबों को

इक दिन अम्बर का हर सूरज पिघलेगा
इक दिन टूट के गिरना है मह्ताबों* को

होटल आलीशान खुला है क़स्बे में
सहमा-सहमा देख रहा हूँ ढाबों को

अपनी पर आ जायें कलियां भी तो फिर
जल मरना पड़ सकता है तेज़ाबों को

दिल के महल पर नक़्श तुम्हारा ही है नाम
गौर से देखो मीनारों,मेहराबों को

लाज कलम की रखना 'सौरभ' जीते जी
रखना हर सूरत महफ़ूज़ क़िताबों को.

अज़ाब=पीड़ा
मह्ताब=चाँद.
ग़ज़ल
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ताक़त का जिसको नश्शा हो जाता है
उसका लहजा ज़हर-बुझा हो जाता है

रुकता है इक रहरौ* पास तमाशे के
देखते-देखते इक मजमा हो जाता है

और बहारों से क्या शिकवा है मुझको
बस इक दिल का ज़ख्म हरा हो जाता है

आँखों वाले लोग ही कौन से बेहतर हैं
आँखों को भी तो धोखा हो जाता है

कुछ अच्छा करने की कोशिश में मुझसे
काम हमेशा कोई बुरा हो जाता है

क्यों अम्बर के तारे गिनने लगता हूँ
रात ढले मुझको ये क्या हो जाता है

बिखरी खुशियों को आवाज़ लगाता हूँ
ग़म का दस्ता जब यकजा* हो जाता है

सूरज की वहशत बढती जाती है और
धीरे-धीरे सब सहरा हो जाता है

‘सौरभ’ प्यार ज़माने से कुछ हासिल कर
सबको घर,गाड़ी,पैसा हो जाता है.

रहरौ= मुसाफ़िर
यकजा=इकट्ठा
ग़ज़ल
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उदास मौसमों में क़हक़हे उछालते हैं
तमाम ग़म पे चलो आज ख़ाक डालते हैं

कभी-कभी तो मुझे रश्क* होने लगता है
बड़े हसीन यक़ीनन तिरे मुग़ालते हैं

गुनाह कर के बरी हो तो जाओगे लेकिन
मियाँ सुने  हैं पसे-ज़ीस्त* भी अदालते हैं

सज़ा मिली है उन्हें जागने की नींद में भी
जनाब साँप अपने आस्तीं में पालते हैं

मेरे वजूद पे तो उनकी हुक्मरानी है
वही बिखेरते हैं मुझको और संभालते हैं

कहाँ की शायरी ‘सौरभ’, कहाँ का इल्मो-हुनर
ग़ुबार दिल के फ़क़त शेर में निकालते हैं.

रश्क=ईर्ष्या
पसे-ज़ीस्त=जीवन के बाद