स्वागतम!

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December 3, 2013

ग़ज़ल
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सियाह रात के दरिया को पार करते चलो
बस एक दूसरे को होशियार करते चलो

उफ़ुक़ के नूर से गर मुतमईन हो न सको
नसीमे-सुब्ह का तो एतबार करते चलो

बटोर लाओ ज़रा ख़ुद को चार सम्तों से
सफ़ें बना के बढ़ो,अब क़तार करते चलो

क़याम ताइरों कुछ देर मेरे आँगन में
तमाम घर को मिरे ख़ुशगवार करते चलो

तुम्हारी बात से मुझको तो इत्तिफ़ाक़ नहीं
मुख़ालिफ़ों में मुझे भी शुमार करते चलो

उसूल एक ही होता है सिर्फ़ जंगल का
शिकार बनते रहो या शिकार करते चलो

जो सल्तनत है तुम्हारी तो लाज़िमी है क्या
चमन तमाम को तुम  रेगज़ार करते चलो?

ख़ुलूस ख़र्च करो हाथ खोल कर ‘सौरभ’
लुटाओ प्यार, दिलो-जां निसार करते चलो.
ग़ज़ल
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रास्ते कुहसार में भी खोजता रहता हूँ मैं
हाँ अना की सब चटानें तोड़ता रहता हूँ मैं

इन दिनों तो ख्वाहिशों की गुनगुनी सी धूप में
ओढ़ कर इक ज़ब्त की चादर पड़ा रहता हूँ मैं

जैसे इक सिक्के के दो पहलू हों वैसे ही हैं हम
रो रहा होता है वो और भीगता रहता हूँ मैं

सोचता तो रोज ही हूँ उससे हाले-दिल कहूँ
उसके आगे जाने क्यूँकर बुत बना रहता हूँ मैं

सोचने से ही फकत माहौल बदलेगा नहीं
बस यही इक बात हर दम सोचता रहता हूँ मैं

एक हद तो दोस्ती की है ही मेरे वास्ते
एक हद तक दुश्मनी भी झेलता रहता हूँ मैं

ये नहीं कि पार होने की मुझे जल्दी नहीं
आदतन मौजों से लेकिन खेलता रहता हूँ मैं

रात-दिन उलझाय रखता है मुझे तकरार में
कौन है मुझमें ये किससे जूझता रहता हूँ मैं

दूँ भी आखिर किसलिए जज्बात पर ताला कोई
मैं हूँ दरवाजा मुहब्बत का खुला रहता हूँ
ग़ज़ल
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अना* शाइस्तगी* से है मुख़ातिब
अँधेरा रौशनी से है मुख़ातिब

सवालों में है गुम पहचान मेरी
लहू मेरा मुझी से है मुख़ातिब

डरा-सहमा मिरे जैसा सफ़ीना*
गरजती इक नदी से है मुख़ातिब

कहीं ख़ुशियों के आगे ग़म खड़े हैं
कहीं नेकी बदी से है मुख़ातिब

मैं जिससे चाहता हूँ बच निकलना
मेरा हर पल उसी से है मुख़ातिब

वो चौखट तो न आई क्या करूँ अब
थकन, आवारगी से है मुख़ातिब

कोई बच्ची हँसेगी नींद में क्यूँ
परी शायद परी से है मुख़ातिब

चुनौती अस्ल उसको अब मिली है
कमी आसूदगी* से है मुख़ातिब

तेरा ग़म अब नहीं तनहा है 'सौरभ'
तेरा ग़म शायरी से है मुख़ातिब.

अना=दंभ
शाइस्तगी=विनम्रता
सफीना=नाव
आसूदगी=संतुष्टि
ग़ज़ल
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ठोकरें खायी मगर जानिबे-मंज़िल हुआ मैं
उसको पाने की तलब में किसी क़ाबिल हुआ मैं

रुक गयी आके तिरी यादों की टोली मुझमें
दौर पर दौर चले अश्कों के महफ़िल हुआ मैं

वार था घात में बैठे हुए कुछ ख़ाबों का
जां बचानी थी मुझे इसलिये क़ातिल हुआ मैं

एक जां कर गयी हम दोनों को, क़ुर्बत आख़िर
तुम कि इक दरिया हुए जिसका कि साहिल हुआ मैं

दर्द के ढेर पे लेटा हूँ मैं चेहरा ढाँपे
हिज्र में देख लो किस दरजा हूँ काहिल हुआ मैं

रहमतें करता रहा है वो सदा से मुझ पर
रहमदिल होने का उसके तभी क़ाइल हुआ मैं

खुद में लौटा तो महकता ही रहा पहरों तक
भीड़ में जब भी तेरी यादों की शामिल हुआ मैं

बादलों में तिरी तस्वीर बनी थीं जानां
तेग़ लटकी थी मेरे सर पे …तो गाफ़िल हुआ मैं

बस इसी बात से तस्कीन मुझे है ‘सौरभ’
जी नहीं मानता है मेरा कि बुज़दिल हुआ मैं
ग़ज़ल
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क़फ़स में ज़ीस्त में मैं आ फंसा क्या
“यहाँ से बंद है हर रास्ता क्या”
मेरी दुनिया से निकली आश्नाई
मगर ख़ुद से भी हूँ मैं आश्ना क्या
मुझे पढनी पड़ेंगी चुप्पियाँ भी
मुख़ालिफ़ हो गए सब हमनवा क्या
बहुत ख़ुश है निगाहें फेर कर वो
तो बदलूँ मैं भी अपना ज़ाविया क्या
उफ़क़ के आरिज़ों पर सुब्ह के वक़्त
उतर आता  है कुछ रंगे-हया क्या
थकन से लेट जाती है फ़ज़ा भी
हर इक शब ओढ़ कर काली रिदा क्या
नहीं देखा बिछुड़ते वक़्त मुड़ के
मैं इस दर्जा हुआ हूँ पारसा क्या
अचानक धूप कम लगने लगी है
कोई बादल हुआ दामन-कुशा क्या
किनारे हो खड़े किसलिए ‘सौरभ’
तुम्हे भी चाहिए इक नाख़ुदा क्या.
ग़ज़ल
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हसरतों से रहगुज़र को देखता रहता हूँ मैं
मैं हूँ दरवाज़ा मुहब्बत का खुला रहता हूँ मैं

उसकी यादें गूंथ कर एहसास की तस्बीह में
रात-दिन अब उँगलियों पर फेरता रहता हूँ मैं

मुन्तजिर शायद नहीं है वो दुआओं का मेरी
पर उसे दिल से दुआएं भेजता रहता हूँ मैं

लम्स उस मासूम का करता है ताज़ादम मुझे
चाहे कितना भी परेशां या थका रहता हूँ मैं

एक दूरी सी बना रक्खी है अपने आप से
आईने की भी निगाहों से छुपा रहता हूँ मैं

एक धुंधली सी फ़जां पर ज़िन्दगी तहरीर है
जिसको पढने में हमेशा मुब्तिला रहता हूँ मैं

कुछ भयानक से मनाज़िर ख्वाब में हैं आजकल
दश्त है सुनसान जिसमें चीखता रहता हूँ मैं
ग़ज़ल
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आसमां,अब्रो-हवा से आशनाई चाहिए
हाँ क़फ़स से हर परिंदे को रिहाई चाहिए
फैसलाकुन जंग हो जाए हुजूमे-फिक्र से
हार हो कि जीत पर मुझको लड़ाई चाहिए
मुंह फुला कर किसलिए बैठे हो,चुप हो किसलिए
क्या खिलौना चाहिए ,कैसी मिठाई चाहिए
रात की तारीकियों पर मैं उजाला लिख तो दूँ
बस पसीने की मुझे कुछ रोशनाई चाहिए
ये अजब दस्तूर है नाराज़गी का प्यार में
आँख बस दो-एक पल में डबडबाई चाहिए
किन हदों तक वुसअतें शफ्फाफियों की आ गईं
आपको बारिश भी अब धोई ,नहाई चाहिए
कामयाबी के लिए आसान हैं शर्तें मियाँ
बेईमानी,बेहिसी और बेहयाई चाहिए
ग़ज़ल
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सहरा है तो दरिया कर
कुछ हट कर भी सोचा कर

सूरज को मत कोसा कर
घर के परदे खोला कर

सबसे झगड़ा मोल न ले
इस मेयार को ऊँचा कर

तू तो ख़ुशबू जैसा है
दिल-बस्ती से गुज़रा कर

अश्क बड़ा सरमाया है
सोच-समझ कर खर्चा कर

हाथ पे रख कर हाथ न बैठ
उसके घर तक जाया कर

दुश्मन अपने भीतर है
अपनी जानिब हमला कर

शोर ग़ज़ल में ठीक नहीं
कुछ ख़ामोशी बरता कर

इश्क़ का हासिल रुसवाई
बस कर ‘सौरभ’ तौबा कर
ग़ज़ल
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कुछ फ़सीलें उठाने की कोशिश
बाढ़ में घर बचाने की कोशिश

घिर रहा है उफ़ुक़ पर अँधेरा
अब करूँ टिमटिमाने की कोशिश

दर्द की ये अदा है पुरानी
वो करेगा डराने की कोशिश

हार जायेंगे आंसू यक़ीनन
कीजिये मुस्कुराने की कोशिश

याद आयेंगे सारे मनाज़िर
तुम करो तो भुलाने की कोशिश

जाल में फँस गए पाँव तो क्या
 मैं करूँ छटपटाने की कोशिश