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January 18, 2016

ग़ज़ल

बेचैन थे नाहक ही,बेकार ही बेकल थे
हम उसके लिए केवल इक गुज़रा हुआ कल थे
कश्ती की सवारी की इतनी सी कहानी थी
दरिया वो कुशादा था और हाथ मेरे शल थे
रंजीदा सी ये शक्लें यारो की नहीं मेरे
इन पर तो ख़ुमारी थी, ये लोग तो पागल थे
किस्मत से मगर रस्ता पथरीला मिला इनको
आग़ाज़े सफ़र पर तो ये पाँव भी कोमल थे
तुझ तक ये ख़बर 'सौरभ' कुछ देर से पहुंची है
अब मर भी चुके होंगे, वो लोग जो घायल थे।

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