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December 16, 2013

ग़ज़ल
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द्वार पलकों की झालर टंगी है प्रिये
प्रीत की अल्पना भी सजी है प्रिये

दो महावर रचे पैरों की मुन्तज़िर
आरज़ूओं की इक पालकी है प्रिये

ये तुम्हारी प्रतीक्षा के भीगे पहर
जैसे रिम-झिम की कोई झड़ी है प्रिये

दिन की समिधा ह्रदय के हवन कुंड में
शाम क्या है तिरी आरती है प्रिये

मेरी नींदें न जाने कहाँ उड़ गईं
रहगुज़र पे लगी टकटकी है प्रिये

इक परिंदे ने यूँ शोर बरपा दिया
हर किसी को ख़बर हो चुकी है प्रिये

ख़ुद महकती हवा ने बताया मुझे
छू के वो तुम को ही आ रही है प्रिये

दिल की दहलीज़ पर दीप जलने लगे
जह्नो-जां में हुई रौशनी है प्रिये

कुछ ज़ियादा ही मसरूफ़ हूँ इन दिनों
मसअला हर अभी मुल्तवी है प्रिये

चैन पड़ता कहाँ है मुझे एक पल
रूह तक में मच खलबली है प्रिये

धड़कनों पे नियंत्रण मैं कैसे रखूं
पास आई मिलन की घड़ी है प्रिये.

भेज दो आगमन की सहर भेज दो
रात काटे नहीं कट रही है प्रिये.

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