ग़ज़ल
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हर आँख में उदासी,हर दिल बुझा-बुझा है
ये कौन रुत है यारों,मौसम ये कौन सा है
बाज़ार में ख़ुशी के सब ग़म ख़रीदते हैं
नुक्सान में अधिकतर,बस कुछ को फ़ायदा है
मजबूरियां समझिये उस आदमी की साहब
सर कैसे वह उठाये,कर्ज़ों तले दबा है
जो लोग जीतते हैं,वो मुझको भी बताएं
क्या जीतने के गुर हैं औ' कौन जीतता है
ऐ आसमान वाले कुछ सोच तो ज़मीं की
गर्मी की है न कोई,सर्दी की इंतिहा है
मैं बेड़ियों से यारी कर के ही काट लूँगा
ये कैदे बा-मशक्कत जो तूने की अता है
दुश्वारियां सफ़र की ख़ुदमुझसे कह गई हैं
'सौरभ' है अज्म ग़र तो आसान रास्ता है.
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हर आँख में उदासी,हर दिल बुझा-बुझा है
ये कौन रुत है यारों,मौसम ये कौन सा है
बाज़ार में ख़ुशी के सब ग़म ख़रीदते हैं
नुक्सान में अधिकतर,बस कुछ को फ़ायदा है
मजबूरियां समझिये उस आदमी की साहब
सर कैसे वह उठाये,कर्ज़ों तले दबा है
जो लोग जीतते हैं,वो मुझको भी बताएं
क्या जीतने के गुर हैं औ' कौन जीतता है
ऐ आसमान वाले कुछ सोच तो ज़मीं की
गर्मी की है न कोई,सर्दी की इंतिहा है
मैं बेड़ियों से यारी कर के ही काट लूँगा
ये कैदे बा-मशक्कत जो तूने की अता है
दुश्वारियां सफ़र की ख़ुदमुझसे कह गई हैं
'सौरभ' है अज्म ग़र तो आसान रास्ता है.
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