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December 16, 2013

ग़ज़ल
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यारबाशी की निशानी है अभी तक गाँव में
इक पुराना पेड़ बाक़ी है अभी तक गाँव में

पाँव को  सीवान पर रखते मेरे ज़ेरे बदन
एक सिहरन दौड़ जाती है अभी तक गाँव में

तह किये रक्खे हैं जिसमे बालपन के रात-दिन
याद की वो आलमारी है अभी तक गाँव में

वक़्त की मौजें हमें परदेस तो ले आ गईं
पर हमारी खेत-बाड़ी है अभी तक गाँव में

बेमेहर हालात हैं यूँ मौसमों के वास्ते
मौसमों की मेहरबानी है अभी तक गाँव में

घर के पिछवाड़े के उस सूखे कुँए पर दो दिए
रोज़ काकी बाल आती है अभी तक गाँव में

हर तरफ इक हड़बड़ी सी,बेतरह बेचैनियाँ
कुफ्र लेकिन जल्दबाजी है अभी तक गाँव में

नफरतों से तर हमारा आज है तो क्या हुआ
प्यार से लबरेज़ माज़ी है अभी तक गाँव में.

खुशबुएँ जिनकी रहेंगी वे रहें या ना रहें
लोग ऐसे जाफ़रानी हैं अभी तक गाँव में.


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