हिर्सो-हवस के नाम ये दिन-रात की तलब
इम्दाद की उमीद, मफ़ादात की तलब
वो सानिहे कि सोच बदलनी पड़ी मुझे
पैदाइशी नहीं थी ख़यालात की तलब
मैं भी किसी मसीहा के हूँ इंतज़ार में
तुमको भी ग़ालिबन है करामात की तलब
ख़बरों में एक लुत्फ़ का पहलू तो है मगर
अच्छी नहीं है इतनी भी हालात की तलब
कैसा अज़ीब रोग मिरे जी को लग गया
हर वक़्त है किसी से मुलाक़ात की तलब
जुरअत से अपनी ख़ुद भी मैं हैरान हूँ बहुत
बढती ही जा रही है सवालात की तलब
तू भी गुनाहगार यक़ीनन है ज़ात का
‘सौरभ’ तिरी सज़ा भी वही, ज़ात की तलब
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