दावा करूँ कि संग था इक, वो गुहर न था
इतना यक़ीन मुझको मिरी आँखों पर न था
हैवानियत से जिसकी यूँ हैरतज़दा थे लोग
इंसान था मियां वो कोई जानवर न था
बू ख़ून की न आती थी किस हाथ से कहो
दामन लहू से बोलो ज़रा किसका तर न था
था हमक़दों का ख़ाक उड़ाता हुज़ूम इक
परचम कहीं नहीं था, कोई राहबर न था
उसका ख़याल, उसकी तलब, उसकी जुस्तजू
‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’
ताज़ा है दिल का ज़ख्म मगर हँस रहा हूँ मैं
ग़मगीन रहना था अभी अफ़सोस करना था
रह-रह के कसमसाता था क्या जिस्म में मिरे
‘सौरभ’ बदन में क़ैद मिरे कुछ अगर न था.
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