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August 15, 2014

ग़ज़ल



सफ़ेद रंग भी इक ज़ाविये से काला है
सियाहियों में भी पैबस्त कुछ उजाला है

ख़ता ज़रा भी नहीं रास्तों के काँटों की
गुनाहगार मिरे पाँव का ही छाला है

ये कैसा खौफ़ तुझे है बता मिरे भाई
निगाहें चीख रही हैं, ज़बां पे ताला है

ये सर्द रात,ये ख़लवत, अलाव माजी का
बदन पे गुज़रे दिनों का मिरे दुशाला है

अलमनसीबों से दरयाफ़्त कर के बतलाता
‘अँधेरा है कि तिरे शह्र में उजाला है’

ख़बर तवज्जो के लायक़ नहीं है वैसे तो
तिरे बयान में बेशक बहुत मसाला है

ज़माने भर की जुटा लेगा बदगुमानी वो
उसे सचाई से क्या और मिलने वाला है

मिज़ाजपुर्सी तो करते हैं चार लोग तिरी
ये कम नहीं है, तू ‘सौरभ’ नसीबवाला है

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