ग़ज़ल
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सरकार बख्शते हैं मुझे नौकरी सही
फिर भी ग़लत को कह न सकूंगा कभी सही
ज़ालिम ने फिर मचाया वो कुहराम एक दिन
इक उम्र मेरे दिल ने मिरी बेरुख़ी सही
आवाज़ दूं, पुकारूं किसी को मैं दश्त में
दिखलाई तो दे मुझको कोई आदमी सही
सच-झूठ की कहानी मुकम्मल न जानिये
कुछ आख़िरी ग़लत है न कुछ आख़िरी सही
रहबर ने बार-बार ही भटका दिया मुझे
साबित हुई हमेशा मिरी गुमरही सही
इक आपके अलावा ग़लत है हरेक शख़्स
‘अच्छा ये आप समझे हैं,अच्छा यही सही’
हालांकि मैंने तुमको सदा अनसुना किया
‘सौरभ’ तुम्हारी बात तो हर बार थी सही.
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