ग़ज़ल
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सहरा है तो दरिया कर
कुछ हट कर भी सोचा कर
सूरज को मत कोसा कर
घर के परदे खोला कर
सबसे झगड़ा मोल न ले
इस मेयार को ऊँचा कर
तू तो ख़ुशबू जैसा है
दिल-बस्ती से गुज़रा कर
अश्क बड़ा सरमाया है
सोच-समझ कर खर्चा कर
हाथ पे रख कर हाथ न बैठ
उसके घर तक जाया कर
दुश्मन अपने भीतर है
अपनी जानिब हमला कर
शोर ग़ज़ल में ठीक नहीं
कुछ ख़ामोशी बरता कर
इश्क़ का हासिल रुसवाई
बस कर ‘सौरभ’ तौबा कर
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सहरा है तो दरिया कर
कुछ हट कर भी सोचा कर
सूरज को मत कोसा कर
घर के परदे खोला कर
सबसे झगड़ा मोल न ले
इस मेयार को ऊँचा कर
तू तो ख़ुशबू जैसा है
दिल-बस्ती से गुज़रा कर
अश्क बड़ा सरमाया है
सोच-समझ कर खर्चा कर
हाथ पे रख कर हाथ न बैठ
उसके घर तक जाया कर
दुश्मन अपने भीतर है
अपनी जानिब हमला कर
शोर ग़ज़ल में ठीक नहीं
कुछ ख़ामोशी बरता कर
इश्क़ का हासिल रुसवाई
बस कर ‘सौरभ’ तौबा कर
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