ग़ज़ल
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हसरतों से रहगुज़र को देखता रहता हूँ मैं
मैं हूँ दरवाज़ा मुहब्बत का खुला रहता हूँ मैं
उसकी यादें गूंथ कर एहसास की तस्बीह में
रात-दिन अब उँगलियों पर फेरता रहता हूँ मैं
मुन्तजिर शायद नहीं है वो दुआओं का मेरी
पर उसे दिल से दुआएं भेजता रहता हूँ मैं
लम्स उस मासूम का करता है ताज़ादम मुझे
चाहे कितना भी परेशां या थका रहता हूँ मैं
एक दूरी सी बना रक्खी है अपने आप से
आईने की भी निगाहों से छुपा रहता हूँ मैं
एक धुंधली सी फ़जां पर ज़िन्दगी तहरीर है
जिसको पढने में हमेशा मुब्तिला रहता हूँ मैं
कुछ भयानक से मनाज़िर ख्वाब में हैं आजकल
दश्त है सुनसान जिसमें चीखता रहता हूँ मैं
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हसरतों से रहगुज़र को देखता रहता हूँ मैं
मैं हूँ दरवाज़ा मुहब्बत का खुला रहता हूँ मैं
उसकी यादें गूंथ कर एहसास की तस्बीह में
रात-दिन अब उँगलियों पर फेरता रहता हूँ मैं
मुन्तजिर शायद नहीं है वो दुआओं का मेरी
पर उसे दिल से दुआएं भेजता रहता हूँ मैं
लम्स उस मासूम का करता है ताज़ादम मुझे
चाहे कितना भी परेशां या थका रहता हूँ मैं
एक दूरी सी बना रक्खी है अपने आप से
आईने की भी निगाहों से छुपा रहता हूँ मैं
एक धुंधली सी फ़जां पर ज़िन्दगी तहरीर है
जिसको पढने में हमेशा मुब्तिला रहता हूँ मैं
कुछ भयानक से मनाज़िर ख्वाब में हैं आजकल
दश्त है सुनसान जिसमें चीखता रहता हूँ मैं
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