स्वागतम!

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December 3, 2013

ग़ज़ल
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क़फ़स में ज़ीस्त में मैं आ फंसा क्या
“यहाँ से बंद है हर रास्ता क्या”
मेरी दुनिया से निकली आश्नाई
मगर ख़ुद से भी हूँ मैं आश्ना क्या
मुझे पढनी पड़ेंगी चुप्पियाँ भी
मुख़ालिफ़ हो गए सब हमनवा क्या
बहुत ख़ुश है निगाहें फेर कर वो
तो बदलूँ मैं भी अपना ज़ाविया क्या
उफ़क़ के आरिज़ों पर सुब्ह के वक़्त
उतर आता  है कुछ रंगे-हया क्या
थकन से लेट जाती है फ़ज़ा भी
हर इक शब ओढ़ कर काली रिदा क्या
नहीं देखा बिछुड़ते वक़्त मुड़ के
मैं इस दर्जा हुआ हूँ पारसा क्या
अचानक धूप कम लगने लगी है
कोई बादल हुआ दामन-कुशा क्या
किनारे हो खड़े किसलिए ‘सौरभ’
तुम्हे भी चाहिए इक नाख़ुदा क्या.

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