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December 1, 2013

ग़ज़ल
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उदास मौसमों में क़हक़हे उछालते हैं
तमाम ग़म पे चलो आज ख़ाक डालते हैं

कभी-कभी तो मुझे रश्क* होने लगता है
बड़े हसीन यक़ीनन तिरे मुग़ालते हैं

गुनाह कर के बरी हो तो जाओगे लेकिन
मियाँ सुने  हैं पसे-ज़ीस्त* भी अदालते हैं

सज़ा मिली है उन्हें जागने की नींद में भी
जनाब साँप अपने आस्तीं में पालते हैं

मेरे वजूद पे तो उनकी हुक्मरानी है
वही बिखेरते हैं मुझको और संभालते हैं

कहाँ की शायरी ‘सौरभ’, कहाँ का इल्मो-हुनर
ग़ुबार दिल के फ़क़त शेर में निकालते हैं.

रश्क=ईर्ष्या
पसे-ज़ीस्त=जीवन के बाद 

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