ग़ज़ल
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वीरानियों के ख़ार* तो फूलों की छुअन भी
इस राह में आये हैं बियाबां भी ,चमन भी
खुलना था फ़क़त एक दरीचा* मेरे घर का
फिर रौशनी भी आई, हुई दूर घुटन भी
बच्चे ने सजाई है कोई और ही दुनिया
खींचा है जहां बाघ वहीँ रक्खा हिरन भी
याद अपने वतन की मुझे आती नहीं अब तो
अब भूल चूका होगा मुझे मेरा वतन भी
हस्सास* बना डाला मुझे हद से ज़ियादा
तिस पर से मुहब्बत ने दिया शेर का फ़न भी
किस खोज में थे शह्र के सब लोग न जाने
चेहरों पे.उदासी भी है आंखों में थकन भी
आसान नहीं है ये सफ़र रूह का ‘सौरभ’
हाइल* है तिरी राह में इक दश्ते-बदन* भी.
ख़ार=कांटे
दरीचा=खिड़की
हस्सास=संवेदनशील
हाइल=अवरोधक
दश्ते-बदन=बदन रुपी जंगल
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वीरानियों के ख़ार* तो फूलों की छुअन भी
इस राह में आये हैं बियाबां भी ,चमन भी
खुलना था फ़क़त एक दरीचा* मेरे घर का
फिर रौशनी भी आई, हुई दूर घुटन भी
बच्चे ने सजाई है कोई और ही दुनिया
खींचा है जहां बाघ वहीँ रक्खा हिरन भी
याद अपने वतन की मुझे आती नहीं अब तो
अब भूल चूका होगा मुझे मेरा वतन भी
हस्सास* बना डाला मुझे हद से ज़ियादा
तिस पर से मुहब्बत ने दिया शेर का फ़न भी
किस खोज में थे शह्र के सब लोग न जाने
चेहरों पे.उदासी भी है आंखों में थकन भी
आसान नहीं है ये सफ़र रूह का ‘सौरभ’
हाइल* है तिरी राह में इक दश्ते-बदन* भी.
ख़ार=कांटे
दरीचा=खिड़की
हस्सास=संवेदनशील
हाइल=अवरोधक
दश्ते-बदन=बदन रुपी जंगल
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