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December 1, 2013


 ग़ज़ल
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ज़रा सा ज़ात* से दीगर भी हूँ
मैं जो हूँ,उससे कुछ हट कर भी हूँ

मियाँ बर्ताव पर निर्भर है सब
अगर मैं मोम हूँ,पत्थर भी हूँ

बहुत मुश्किल मिरा किरदार है
कि हूँ मैं खेल में,बाहर भी हूँ

मिरा कुछ शौक़ है आवारगी
मैं तिस पर शहर में बेघर भी हूँ

फ़क़त मैं ज़िस्म की कैसे सुनूँ
मैं अपनी रूह का नौकर भी हूँ

तबीअत की मेरे मत पूछिए
बहुत हस्सास* हूँ,शायर भी हूँ

मिरा मक़सद है बस उसकी हँसी
मैं उसके वास्ते जोकर भी हूँ

मिरी दीवानगी हद में ज़रा
कि मैं इक बाप हूँ,शौहर भी हूँ

--सौरभ

ज़ात=शख्सियत

हस्सास=संवेदनशील ग़ज़ल

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