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December 1, 2013

ग़ज़ल

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एक रौज़न* के अभी किरदार में हूँ मैं
गौर से देखो इसी दीवार में हूँ मैं

सब मनाज़िर* ज़र्द* से पड़ने लगेंगे क्यों
बेयक़ीनी के किसी आज़ार* में हूँ मैं

टूट जाये आसमां धरती भी फट जाए
क्या मुझे परवा कि बज़्मे-यार में हूँ मैं

ज़ह्न में औलाद है, और घर की जानिब हूँ
रुक नहीं सकता अभी रफ़्तार में हूँ मैं

दख्ल मेरा भी रहे कुछ मेरी हस्ती में
ये न कल महसूस हो बेकार में हूँ मैं

घर की हर शै क्यों मुझे बेनूर लगती है
क्या ज़ियादा आज कल बाज़ार में हूँ मैं

शुहरतों का आखिरी चारा जराइम* था
देखिये अब किस क़दर अखबार में हूँ मैं

गुफ़्तगू से कब मुझे परहेज़ है 'सौरभ'
बोलता-सुनता मगर अशआर* में हूँ मैं.

रौज़न=दीवार का छिद्र
मनाज़िर=दृश्य
ज़र्द=पीला
जराइम=अपराध
अशआर=शेर का बहुवचन

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