ग़ज़ल
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एक रौज़न* के अभी किरदार में हूँ मैं
गौर से देखो इसी दीवार में हूँ मैं
सब मनाज़िर* ज़र्द* से पड़ने लगेंगे क्यों
बेयक़ीनी के किसी आज़ार* में हूँ मैं
टूट जाये आसमां धरती भी फट जाए
क्या मुझे परवा कि बज़्मे-यार में हूँ मैं
ज़ह्न में औलाद है, और घर की जानिब हूँ
रुक नहीं सकता अभी रफ़्तार में हूँ मैं
दख्ल मेरा भी रहे कुछ मेरी हस्ती में
ये न कल महसूस हो बेकार में हूँ मैं
घर की हर शै क्यों मुझे बेनूर लगती है
क्या ज़ियादा आज कल बाज़ार में हूँ मैं
शुहरतों का आखिरी चारा जराइम* था
देखिये अब किस क़दर अखबार में हूँ मैं
गुफ़्तगू से कब मुझे परहेज़ है 'सौरभ'
बोलता-सुनता मगर अशआर* में हूँ मैं.
रौज़न=दीवार का छिद्र
मनाज़िर=दृश्य
ज़र्द=पीला
जराइम=अपराध
अशआर=शेर का बहुवचन
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एक रौज़न* के अभी किरदार में हूँ मैं
गौर से देखो इसी दीवार में हूँ मैं
सब मनाज़िर* ज़र्द* से पड़ने लगेंगे क्यों
बेयक़ीनी के किसी आज़ार* में हूँ मैं
टूट जाये आसमां धरती भी फट जाए
क्या मुझे परवा कि बज़्मे-यार में हूँ मैं
ज़ह्न में औलाद है, और घर की जानिब हूँ
रुक नहीं सकता अभी रफ़्तार में हूँ मैं
दख्ल मेरा भी रहे कुछ मेरी हस्ती में
ये न कल महसूस हो बेकार में हूँ मैं
घर की हर शै क्यों मुझे बेनूर लगती है
क्या ज़ियादा आज कल बाज़ार में हूँ मैं
शुहरतों का आखिरी चारा जराइम* था
देखिये अब किस क़दर अखबार में हूँ मैं
गुफ़्तगू से कब मुझे परहेज़ है 'सौरभ'
बोलता-सुनता मगर अशआर* में हूँ मैं.
रौज़न=दीवार का छिद्र
मनाज़िर=दृश्य
ज़र्द=पीला
जराइम=अपराध
अशआर=शेर का बहुवचन
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