ग़ज़ल
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अपनी चुप्पी पचा न पाये हम
नींद में खूब बड़बड़ाये हम
क्यों न होंगे तपे-तपाये हम
उम्र भर धूप में नहाये हम
इक तो रातें तवील हो गई हैं
शम्म भी बैठे हैं बुझाये हम
सिर्फ बेचैनियाँ ही बचनी थीं
हैं तो ख़ाहिश के अपनी साये हम
रेत की थी हमारी हस्ती क्या
एक ठोकर में भरभराये हम
कोई तहरीर थी हवाओं में
सिर्फ उन्वान देख पाये हम
है ज़लालत से साबक़ा बाहर
घर में घुसते हैं सर उठाये हम
ये बदन इक तिलिस्म था हमको
तोड़ हरगिज़ न जिसको पाये हम
ख़ाब का दर खुले कि दाखिल हों
एक भी पल बिना गँवाये हम
मोतबर बेख़ुदी में थे 'सौरभ'
होश में आ के लड़खड़ाए हम।।
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अपनी चुप्पी पचा न पाये हम
नींद में खूब बड़बड़ाये हम
क्यों न होंगे तपे-तपाये हम
उम्र भर धूप में नहाये हम
इक तो रातें तवील हो गई हैं
शम्म भी बैठे हैं बुझाये हम
सिर्फ बेचैनियाँ ही बचनी थीं
हैं तो ख़ाहिश के अपनी साये हम
रेत की थी हमारी हस्ती क्या
एक ठोकर में भरभराये हम
कोई तहरीर थी हवाओं में
सिर्फ उन्वान देख पाये हम
है ज़लालत से साबक़ा बाहर
घर में घुसते हैं सर उठाये हम
ये बदन इक तिलिस्म था हमको
तोड़ हरगिज़ न जिसको पाये हम
ख़ाब का दर खुले कि दाखिल हों
एक भी पल बिना गँवाये हम
मोतबर बेख़ुदी में थे 'सौरभ'
होश में आ के लड़खड़ाए हम।।
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