ग़ज़ल
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तन्हाई का इलाज ये मंहगा बहुत पड़ा
उकता के मैंने न्यूज़ का चैनल लगाया था
बस ये कि वज्ह तर्के-तअल्लुक़* की कुछ रहे
उसने ज़रा सी बात पे झगड़ा खड़ा किया
बिगडैल हो चले थे कई दिन से मेरे ख़ाब
सच की छड़ी से शाम उन्हें सीधा कर दिया
खोला था रात माज़ी का इक एलबम कि उफ़
यादों का मेरे ज़ह्न में तांता बंधा रहा
वो बार-बार पूछ रहा था वही सवाल
मजबूर हो के झूठ मुझे बोलना पड़ा
दरिया ने मेरे पाँव उखाड़े शुरूअ में
जब मैं डटा रहा तो वो कमज़ोर पड़ गया
तन्हाई का तुम्हारी था मुमकिन यही इलाज
घर के हर एक कोने को चीज़ों से भर दिया
तर्के-तअल्लुक़= रिश्ता तोड़ना
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तन्हाई का इलाज ये मंहगा बहुत पड़ा
उकता के मैंने न्यूज़ का चैनल लगाया था
बस ये कि वज्ह तर्के-तअल्लुक़* की कुछ रहे
उसने ज़रा सी बात पे झगड़ा खड़ा किया
बिगडैल हो चले थे कई दिन से मेरे ख़ाब
सच की छड़ी से शाम उन्हें सीधा कर दिया
खोला था रात माज़ी का इक एलबम कि उफ़
यादों का मेरे ज़ह्न में तांता बंधा रहा
वो बार-बार पूछ रहा था वही सवाल
मजबूर हो के झूठ मुझे बोलना पड़ा
दरिया ने मेरे पाँव उखाड़े शुरूअ में
जब मैं डटा रहा तो वो कमज़ोर पड़ गया
तन्हाई का तुम्हारी था मुमकिन यही इलाज
घर के हर एक कोने को चीज़ों से भर दिया
तर्के-तअल्लुक़= रिश्ता तोड़ना
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