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December 1, 2013

ग़ज़ल

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फ़रियादें, दरख़्वास्त, गुहारें एक तरफ़
हाकिम,तंज़ीमें*,सरकारें एक तरफ़

दीवानों का बस्ती-बस्ती चर्चा है
इक जानिब सर हैं, तलवारें एक तरफ़

एक तरफ़ हंगामा है आवाज़ों का
और ख़मोशी की झंकारें एक तरफ़

देखें पलड़ा झुकता है अब किस जानिब
एक तरफ़ ग़ैरत, दीनारें* एक तरफ़

एक तरफ़ इन्सान दुबक कर बैठा है
और गुनाहों की ललकारें एक तरफ़

जंग उजालों की ज़ुल्मत* से जारी है
एक तरफ़ रौज़न*, दीवारें एक तरफ़

हाथ झटक कर बादल फिर से दूर गया
छोड़ के धरती की मनुहारें एक तरफ़

मुड़ना है किस ओर करो अब तय ‘सौरभ’
एक तरफ़ तूफाँ, मँझधारें एक तरफ।।

तंज़ीमें=संस्थाएं
दीनारें=सिक्के
ज़ुल्मत=अँधेरा
रौज़न =छिद्र

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