ग़ज़ल
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मेरी तुझसे क्या टक्कर है
मैं इक शय* तू सौदागर है
ख़ाबों तुम आहिस्ता आना
मेरी नींद का पुल जर्ज़र है
ग़ाफिल रहने दो बच्चों को
फिर तो आगे डर ही डर है
दुखियारों की इस बस्ती के
हर घर में इक पूजाघर है
शाम में दिन तब्दील हुआ अब
अब हर साया क़द्दावर है
अच्छे मूड में है वो, दिल की
कहने का अच्छा अवसर है
हाथ मिलाओ अहले-मुहब्बत*
नफ़रत काफ़ी ताक़तवर है
सच मत बोलो उस पागल से
उसके हाथों में पत्थर है
ग़ीबत* की इस आबो-हवा में
‘सौरभ’ का रहना दूभर है
शय=वस्तु
अहले-मुहब्बत=प्यार करने वालों
ग़ीबत= पीठ पीछे निंदा.
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मेरी तुझसे क्या टक्कर है
मैं इक शय* तू सौदागर है
ख़ाबों तुम आहिस्ता आना
मेरी नींद का पुल जर्ज़र है
ग़ाफिल रहने दो बच्चों को
फिर तो आगे डर ही डर है
दुखियारों की इस बस्ती के
हर घर में इक पूजाघर है
शाम में दिन तब्दील हुआ अब
अब हर साया क़द्दावर है
अच्छे मूड में है वो, दिल की
कहने का अच्छा अवसर है
हाथ मिलाओ अहले-मुहब्बत*
नफ़रत काफ़ी ताक़तवर है
सच मत बोलो उस पागल से
उसके हाथों में पत्थर है
ग़ीबत* की इस आबो-हवा में
‘सौरभ’ का रहना दूभर है
शय=वस्तु
अहले-मुहब्बत=प्यार करने वालों
ग़ीबत= पीठ पीछे निंदा.
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