ग़ज़ल
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वो देगा हिज्र का इनआम मुझको
ज़रा भर था नहीं इल्हाम मुझको
बजाता था ग़ज़ल की बाँसुरी मैं
कहा करती थी वो भी श्याम मुझको
उदासी के भँवर में आज फिर से
धकेले जा रही है शाम मुझको
तेरे बिन काटने को दौड़ते हैं
दरो-दीवार,फर्शो-बाम मुझको
सफ़र की इब्तिदा में साथ हैं सब
मगर मालूम है अंजाम मुझको
मेरी तारीफ़ की पर इस अदा से
क़सीदा भी लगा इलज़ाम मुझको
मरासिम दर्द से गहरे हैं मेरे
अगरचे आयगा आराम मुझको
ग़ज़ल से आशिक़ी की इब्तिदा है
अभी रहना है कुछ गुमनाम मुझको
-सौरभ.
(हिज्र=वियोग,इल्हाम=एहसास,दरो- दीवार=दरवाजा और दीवार,फर्शो-बाम=फर्श और छत,इब्तिदा=शुरुआत,क़सीदा=प्रशं सा,मरासिम=प्रेम सम्बन्ध,अगरचे=हालाँकि.)
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वो देगा हिज्र का इनआम मुझको
ज़रा भर था नहीं इल्हाम मुझको
बजाता था ग़ज़ल की बाँसुरी मैं
कहा करती थी वो भी श्याम मुझको
उदासी के भँवर में आज फिर से
धकेले जा रही है शाम मुझको
तेरे बिन काटने को दौड़ते हैं
दरो-दीवार,फर्शो-बाम मुझको
सफ़र की इब्तिदा में साथ हैं सब
मगर मालूम है अंजाम मुझको
मेरी तारीफ़ की पर इस अदा से
क़सीदा भी लगा इलज़ाम मुझको
मरासिम दर्द से गहरे हैं मेरे
अगरचे आयगा आराम मुझको
ग़ज़ल से आशिक़ी की इब्तिदा है
अभी रहना है कुछ गुमनाम मुझको
-सौरभ.
(हिज्र=वियोग,इल्हाम=एहसास,दरो-
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