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December 1, 2013

ग़ज़ल
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मुझको दुनिया नहीं सुहाती है
हाँ मगर ये ख़याल ज़ाती* है

तेज चलना मुझे भी भाता है
पर मेरी सांस फूल जाती है

ख़ाब मुझको अज़ाब* देते हैं
नींद बेचैनियाँ बढ़ाती है

ज़ुल्म मुझसे सहा नहीं जाता
चीख़ मेरी निकल ही जाती है

नीम पागल है ये भिखारन भी
चौक को रोज़ लीप आती है

कोई घर है इन्ही अंधेरों में
दूर इक लौ सी टिमटिमाती है

खोजिये मत तमीज़ मुफलिस* की
भूख तहज़ीब लील जाती है

तीर गर आपके हैं तरकश में
पास अपने भी एक छाती है.

ज़ाती=निजी
अज़ाब=यातना
मुफलिस=निर्धन

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