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December 1, 2013

ग़ज़ल
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सभी यूँ हैं कहने को बाज़ार में
मुनाफ़े का बंटवारा दो-चार में

हटाया गया मेरे कांधों से बोझ
हिलाया था सर मैंने इनकार में

जुनूं ने धकेला नदी में मुझे
ख़िरद* मुझपे हावी है अब धार में

यही एक मौक़ा मिरे पास है
गिराना है ग़म को इसी वार में

मुझे भी शिकायत नहीं दश्त* से
अगर ख़ुश है वो अपने घर -बार में

नुमाइश ही करते थे बैठक में तुम
लगी आख़िरश ज़ंग तलवार में

ख़ुशी में बहुत याद आती है माँ
बहुत गाँव खलता है त्यौहार में

पहाड़ों में खोजूंगा झरना कोई
मैं खिड़की तलाशूंगा दीवार में

हरी दूब शायद दबी हो कोई
'इन्हीं ज़र्द पत्तों के अंबार में '

अमां फर्क़ कुछ तो रखा कीजिये
सुख़नगोई* में और तकरार में

बदलना नहीं कुछ भी 'सौरभ' यहाँ
जलाते हो जी अपना बेकार में.

ख़िरद=बुद्धि
दश्त=जंगल
सुखनगोई=कविता.

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