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December 1, 2013

ग़ज़ल
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ख़ाली-ख़ाली,बेमतलब, बेमानी शाम
एक उदासी की जैसे तुग़यानी शाम

उलझन का भी रब्त नहीं बाक़ी अब तो
मैं उससे हूँ, है मुझसे बेगानी शाम

तनहा, ढलता सूरज सबकी आँखों में
बाँट रही है ये कैसी वीरानी शाम

शह्रों शह्रों एक सा मंज़र फैला है
नाहक ढूंढ रहा हूँ मैं लासानी शाम

ओढ़ हरी चूनर फिर से तुम आ जाओ
और फ़ज़ा में छा जाये फिर धानी शाम

इसके जैसा इश्क़ हमें भी है दिन से
हमको दुश्मन कर लेगी दीवानी शाम

क्यों खोला फिर से तुमने अपना जूड़ा
देखो फिर से हो गई पानी-पानी शाम

वक़्त ठहर जाता है उसकी सुहबत में
कर देती है शब की नाफ़र्मानी शाम

शेर सरीखी लगती थी 'सौरभ' तुमको
रफ्ता-रफ्ता बन गई एक कहानी शाम

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