ग़ज़ल
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नहीं जल पाया ये अंतिम दिया तो
अँधेरा मेरे घर में टिक गया तो
मैं ज़ाहिर कर तो दूँ जज़्बात दिल के
उठा ले गर वो उनका फायदा तो
अभी दिलचस्पियाँ परवान पर हैं
मेरा दम बज़्म में घुटने लगा तो
ख़ुशी से ख़ामुशी ओढ़ी नहीं थी
मैं कहता कुछ मगर कुछ सूझता तो
अदाकारी करो तुम इश्क की पर
उसे सच मान लूँ मैं बावला तो?
दिलासा दे रहा हूँ दूसरों को
गुज़र जाये मुझी पर सानिहा तो
लरज़ते लब फ़क़त मैं देख पाया
बिछुड़ते वक़्त बोला था वो क्या तो
फिरा हूँ दर-ब -दर जिसके लिए मैं
वही गर दे मिरा दर खटखटा तो
मुझे हर हाल में रुकना पड़ेगा
'दिया अपना जो उसने वास्ता तो'
इसी इक ज़ीस्त से तो बाख़बर हूँ
कम अज़ कम जी लूँ मैं इस मर्तबा तो
तेरी निभ जाएगी 'सौरभ' जहाँ से
तू अपने आप से पहले निभा तो
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नहीं जल पाया ये अंतिम दिया तो
अँधेरा मेरे घर में टिक गया तो
मैं ज़ाहिर कर तो दूँ जज़्बात दिल के
उठा ले गर वो उनका फायदा तो
अभी दिलचस्पियाँ परवान पर हैं
मेरा दम बज़्म में घुटने लगा तो
ख़ुशी से ख़ामुशी ओढ़ी नहीं थी
मैं कहता कुछ मगर कुछ सूझता तो
अदाकारी करो तुम इश्क की पर
उसे सच मान लूँ मैं बावला तो?
दिलासा दे रहा हूँ दूसरों को
गुज़र जाये मुझी पर सानिहा तो
लरज़ते लब फ़क़त मैं देख पाया
बिछुड़ते वक़्त बोला था वो क्या तो
फिरा हूँ दर-ब -दर जिसके लिए मैं
वही गर दे मिरा दर खटखटा तो
मुझे हर हाल में रुकना पड़ेगा
'दिया अपना जो उसने वास्ता तो'
इसी इक ज़ीस्त से तो बाख़बर हूँ
कम अज़ कम जी लूँ मैं इस मर्तबा तो
तेरी निभ जाएगी 'सौरभ' जहाँ से
तू अपने आप से पहले निभा तो
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