ग़ज़ल
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मसअलों से जहां के कट कर हम
ज़ात* में क्यूँ रहें सिमट कर हम
ग़ुमरही का अगरचे* ख़तरा है
लीक से देखते हैं हट कर हम
लज्ज़तें दुःख की कम नहीं होतीं
सुख से तो चल दिए उचट कर हम.
एक ठंडक मिली कलेजे को
रो लिए माँ से जब लिपट कर हम
कौन छुप जाता है सदा दे कर
देखते जैसे हैं पलट कर हम
जश्न का लुत्फ़ भी उठाएंगे
रिज्क़* से हाँ मगर निबट कर हम
शोर करता है गर ज़ियादा दिल
चुप करा देते हैं डपट कर हम
-सौरभ.
ज़ात=स्वयं
अगरचे=हालांकि
रिज्क़ =रोज़ी-रोटी
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मसअलों से जहां के कट कर हम
ज़ात* में क्यूँ रहें सिमट कर हम
ग़ुमरही का अगरचे* ख़तरा है
लीक से देखते हैं हट कर हम
लज्ज़तें दुःख की कम नहीं होतीं
सुख से तो चल दिए उचट कर हम.
एक ठंडक मिली कलेजे को
रो लिए माँ से जब लिपट कर हम
कौन छुप जाता है सदा दे कर
देखते जैसे हैं पलट कर हम
जश्न का लुत्फ़ भी उठाएंगे
रिज्क़* से हाँ मगर निबट कर हम
शोर करता है गर ज़ियादा दिल
चुप करा देते हैं डपट कर हम
-सौरभ.
ज़ात=स्वयं
अगरचे=हालांकि
रिज्क़ =रोज़ी-रोटी
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