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December 1, 2013

ग़ज़ल
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ख़ूब पता है अब ये बात अज़ाबों* को
मार नहीं सकते वो मेरे ख़ाबों को

पानी से भी धरती बंजर होती है
कैसे समझाऊं लेकिन सैलाबों को

इक दिन अम्बर का हर सूरज पिघलेगा
इक दिन टूट के गिरना है मह्ताबों* को

होटल आलीशान खुला है क़स्बे में
सहमा-सहमा देख रहा हूँ ढाबों को

अपनी पर आ जायें कलियां भी तो फिर
जल मरना पड़ सकता है तेज़ाबों को

दिल के महल पर नक़्श तुम्हारा ही है नाम
गौर से देखो मीनारों,मेहराबों को

लाज कलम की रखना 'सौरभ' जीते जी
रखना हर सूरत महफ़ूज़ क़िताबों को.

अज़ाब=पीड़ा
मह्ताब=चाँद.

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