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December 1, 2013

ग़ज़ल
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पानी में कंकड़ बरसाया करते थे
वे दिन जब हम लम्हे ज़ाया* करते थे

होड़ हवा से अक्सर लगती थी अपनी
अक्सर उसको धूल चटाया करते थे

देख के हमको राहगुज़र मुस्काती थी
पेड़ भी आगे बढ़ कर छाया करते थे

धूप बटोरा करते थे हम सारा दिन
शाम को बाँट के घर ले जाया करते थे

आज़ घटा अफ़्सुर्दा* करती है हमको
हम बारिश में खूब नहाया करते थे

एक यही हम देखें सब खामोशी से
एक यही हम शोर मचाया करते थे

'सौरभ' शब* थी एक वरक़* सादा जिस पर
लिख-लिख कर हम ख़ाब मिटाया करते थे

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